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यह व्रत शीघ्र फलदायी हैं किन्तु फल न दे तो तीन माह के बाद फिर से व्रत शुरू करना चाहिये। और जब तक मनवांछित फल न मिले तब तक यह व्रत तीन-तीन महीने पर करते रहना चाहिये। तो कभी इसका फल अवश्य मिलता ही है।
व्रत विधि शुरू करने से पहले की विधि
(1) ‘श्रीयंत्र’ के सामने देखकर ‘श्रीयंत्र को प्रणाम।’ ऐसा बोलकर श्रीयंत्र को प्रणाम करें। (इस पुस्तक में ‘श्रीयंत्र’ की छवि दी हुइ है।)
(2) बाद में लक्ष्मी जी के नीचे मुताबिक आठ स्वरूप की छवियाँ को प्रणाम करें। (1) धनलक्ष्मी एवं वैभवलक्ष्मी स्वरूप, (यह पुस्तक में पहले ही उनकी चतुरंगी छवि दी है।) (2) श्री गजलक्ष्मी माँ (3) श्री अधिलक्ष्मी माँ, (4) श्री विजयालक्ष्मी माँ (5) श्री ऐश्रवर्यलक्ष्मी माँ, (6) श्री बीरलक्षमी माँ (7) श्री धान्यलक्ष्मी माँ (8) श्री संतान लक्ष्मी माँ, (3) वाद में नीचे दिया हुआ ‘लक्ष्मी स्तवन’ का पाठ करें। गहने की पूजा करते वक्त बोलने का
लक्ष्मी स्तवन
श्लोक
या रक्ताम्बुजवासिनी विलसिनी चण्डांशु तेजस्विनी।
या रक्त रूधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी।।
या रत्नाकरमन्थनात्प्रगंटिता विष्णोस्वया गेहिनी।
सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती।।

लक्ष्मी स्तवन का हिन्दी में भावार्थ: जो लाल कमल में रहती है, जो अपूर्व कंातिवाली है, जो असहृय तेजवाली है, जो पूर्ण रूप से लाल है, जिसने रक्तरूप वस्त्र पहने हैं, जो भगवान विष्णु को अतिप्रिय है, जो लक्ष्मी मन के आनन्द देती है, जो समुद्रमंथ से प्रकट हुई है, जो विष्णु भगवान की पत्नी है, जो कमल से जन्मी हैं और जो अतिशय शून्य है, वैसी हे लक्ष्मी देवी! आप मेरी रक्षा करें।
वैभवलक्ष्मी व्रत करने का नियम
1. यह व्रत सौभाग्यशाली स्त्रियाॅ करें तो उनका अति उत्तम फल मिलता है। पर घर में यदि सौभाग्यशाली स्त्रियाॅ न हो तो कोई भी स्त्री एवं कुमारिका भी यह व्रत कर सकती है।
2. स्त्री के बदले पुरूष भी यह व्रत करें तो उसे भी उत्तम फल अवश्य मिलता है।
3. यह व्रत पूरी श्रद्धा और पवित्र भाव से करना चाहिये। खिन्न होकर या बिना भाव से यह व्रत नहीं करना चाहिये।
4. यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है। व्रत शुरू करते वक्त 11 या 21 शुक्रवार की मन्नत रखनी पड़ती है। और पुस्तक में लिखी शास्त्रीय विधि अनुसार ही व्रत न करने पर व्रत का चाहिये। मन्नत के शुक्रवार पूरे होने पर विधिपर्वूक और इस पुस्तक में दिखाई गई शास्त्रीय रीति अनुसार उद्यापन विधि करनी चाहिये। यह विधि सरल है किन्तु शास्त्रीय विधि अनुसार व्रत न करने पर व्रत कर जरा भी फल नहीं मिलता है।
5. एक बार व्रत पूरा करने के पश्चात् फिर मन्नत कर सकते हैं और फिर से व्रत कर सकते हैं।
6. माता लक्ष्मी देवी के अनेक स्वरूप है। उनमें उनका धनलक्ष्मी स्वरूप ही ‘वैभवलक्ष्मी’ है और माता लक्ष्मी को श्रीयंत्र अति प्रिय है। व्रत करते वक्त पुस्तक में दिये मां लक्ष्मीजी के हर स्वरूप को और ‘श्रीयंत्र’ को प्रणाम करना चाहिये। तभी व्रत का फल मिलता है। अगर हम इतनी भी मेहनत नहीं कर सकते है तो लक्ष्मी देवी भी हमारे लिये कुछ करने को तैयार नहीं होगी।
7. व्रत के दिन सुबह से ही ‘जय मां लक्ष्मी’ ‘जय मां लक्ष्मी’ का रटन मन ही मन करना चाहिये। और माँ का पूरे भाव से स्मरण करना चाहिये।
8. शक्रवार के दिन यदि आप प्रवास या यात्रा पर गये हांे तो वह शुक्रवार छोड़कर उनके बाद के शुक्रवार को व्रत करना चाहिये पर व्रत अपने ही घर में करना चाहिये। सब मिलाकर जितने शुक्रवार की मन्नत ली हो, उतने शुक्रवार पूरे करने चाहिये।
9. घर में सोना न हो तो चांदी की चीज पूजा में रखनी चाहिये। अगर वह भी न तो रोकड़ रूपया रखना चाहिये।
10. व्रत पूरा होने पर कम से कम सात स्त्रियों को या आपकी इच्छा अनुसार जैसे 11, 21, 51, 101 स्त्रियों को वैभवलक्ष्मी व्रत की पुस्तक कुमकुम का तिलक करके भेंट के रूप में देनी चाहिये। जितनी ज्यादा पुस्तक आप देंगे उतनी माँ लक्ष्मी की ज्यादा कृपा होगी और माँ लक्ष्मी जी का यह अद्भूत व्रत का ज्यादा प्रचार होगा।
11. व्रत के शुक्रवार को स्त्री रजस्वला हो या सूतकी हो तो वह शुक्रवार छोड़ देना चाहिये और बाद के शुक्रवार से व्रत शुरू चाहिये। पर जितने शुक्रवार की मन्न्त हो, उतने शुक्रवार पूरे करने चाहिये।
12. व्रत की विधि शुरू करते वक्त ‘लक्ष्मी स्तवन’ का एक बार पाठ करना चाहिये।
13. व्रत के दिन हो सके तो उपवास करना चाहिये और शाम को व्रत की विधि करके मां का प्रसाद लेकर शुक्रवार करना चाहिये। अगर न हो सके तो फलाहार या एक बार भोजन कर के शुक्रवार करना चाहिये। अगर व्रतधारी का शरीर बहुत कमजोर हो तो ही दो बार भोजन ले सकते है। सबसे महत्व की बात यही है कि व्रतधारी मां लक्ष्मी जी पर पूरी-पूरी श्रद्धा और भावना रखें और ‘मेरी मनोकामना मां पूरी करेगी हीं, ऐसा दृढ संकल्प करें।

वैभवलक्ष्मी व्रत की कथा
एक बड़ा शहर था। इस शहर में लाखों लोग रहते थे। पहले के जमाने के लोग साथ-साथ रहते थे और एक दूसरे के काम आते थे। पर नये जमाने के लोगो को स्वरूप ही अलग सा है। सब अपने काम में रत रहते है। किसी को किसी की परवाह नहीं। घर के सदस्यों को भी एक-दूसरे की परवाह नहीं होती। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गये हैं।
शहर में बुराइयाँ बढ़ गई थी। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे।
कहावत है कि ‘हजारों निराशा में एक अमर आशा छिपी हुई है। इसी तरह इन्ही सारी बुराइयों के बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे।
ऐसे अच्छे लोगों में शीला और उनकी पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति और संतोषी थी। उनका पति भी विवेकी और सुशील था।
शीला और उनका पति ईमानदारी से जीते थे। वे किसी की बुराई करते न थे और प्रभु भजन मंे अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे। उनकी गृहस्थी आदर्श थी और शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे।
शीला की गृहस्थी इसी तरह खुशी-खुशी चल रही थी। पर कहा जाता है कि ‘कर्म की गति अकल है’ विधाता के लिखे लेख कोई नहीं समझ सकता है। इन्सान का नसीब पल भर मेें राजा को रंक बना देता है और रंक को राजा। शीला के पति के अगले जन्म के कर्म भोगने के बाकी रह गये होगें कि वह बुरे लोगो से दोस्ती कर बैठा। वह जल्द से जल्द ‘करोड़पति’ होने के ख्वाब देखने लगा। इसीलिये वह गलत रास्ते पर चढ़ गया और ‘करोड़पति’ की बजाय ‘रोडपित’ बन गया। याने रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी।
शहर में शराब, जुआ, रेस, चरस, गंजा वगैरह बादियां फैली हुई थी। उसमें शीला का पति भी फँस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। जल्द से जल्द पैसे वाला बनने की लालच में दोस्तों के साथ रेस जुआ भी खेलने लगा। इस तरह बचाई हुई धनराशि, पत्नी के गहने, सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिया था।
इसी तरह एक वक्त ऐसा भी था कि वह सुशील पत्नी शीला के साथ मजे में रहता था और प्रभु भजन में सुख-शांति से वक्त व्यतीत करता था। उसके बजाय घर में दरिद्रता और भूखमरी फैल गई। सुख से खाने की बजाय दो वक्त भोजन के लाले पड़ गये और शीला को पति की गालियां खाने का वक्त आया था।
शीला सुशीला और संरकारी स्त्री थी। उसको पति के वर्ताव से बहुत दुःख हुआ। किन्तु वह भगवान पर भरोसा करके बड़ा दिल रख कर दुःख सहने लगी। कहा जाता है कि ‘सुख के पीछे दुःख और दुःख के पीछे सुख’ आता ही है। इसलिये दुःख के बाद सुख आयेगा ही, ऐसी श्रद्धा के साथ शीला प्रभु भक्ति में लीन रहने लगी।
इस तरह शीला असहय दुःख सहते-सहते प्रभुभक्ति में वक्त बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी।
शीला सोच में पड़ी गई कि मुझ जैसे गरीब के घर इस वक्त कौन आया होगा?
फिर भी द्वार पर आये हुए अतिथि का आदर करना चाहिये, ऐसे आर्यधर्म के संस्कार वाली शीला न खड़े होकर द्वार खोला।
देखा तो सामने एक मांजी खड़ी थी। वे बड़ी उम्र की लगती थी। किन्तु उनके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आँखों में माने अमृत वह वहा था। उनका भव्य चेहरा करूणा और प्यार से छलकता था। उनका देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। वैसे शीला इस मांजी को पहचानती न थी। फिर भी उनकी देखकर शीला के रोम-रोम में आनन्द छा गया। शीला मांजी को आदर के साथ घर मंे आयो। घर में बिठाने के लिये कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचा कर फटी हुई चद्दर पर उनको बिठाया।
मंाजी ने कहा: क्यो शीला!मुझे पहचाना नहीं?
शीला ने सकुचा कर कहा माॅ! आपको देखते ही बहुत खुशी हो रही है। बहुत शंाति हो रही है। ऐसा लगता है कि मैं बहुत खुशी हो रही है ऐसा लगता है कि मैं बहुत दिनों से जिसे ढूंढ रही थी वे आप ही है। पर आपको पहचान नहीं सकती।
मंाजी ने हंसकर कहा: क्यो ? भूल गइ? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन कीर्तन होते है, तब मैं भी वहां आती हॅू। वहाॅ हर शुक्रवार को हम मिलते है।
पति गलत रास्ते पर चढ गया तब से शीला बहुत दुःखी हो गई थी और दुःख की मारी वह लक्ष्मी जी को मंदिर में भी नहीं जाती थी। बाहर के लोगो के साथ नजर मिलाते भी उसे शर्म लगती थी। उसने याददास्त पर जोर दिया पर यह मांजी याद नहीं आ रहीं थी।
तभी मांजी ने कहा, ‘तू लक्ष्मीजी के मंदिर में कितने मधुर भजन गाती थी। अभी-अभी तू दिखाई नहीं देती थी, इसलिये मुझे हुआ कि तू क्यों नहीं आती है? कहीं बीमार तो नहीं हो गई है न? ऐसा सोचकर मैं मिलने चली आई हॅू।’
मांजी के अति प्रेम भरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। उसकी आँख में आसु आ गये। मांजी के सामने वह बिलख-बिलख कर रोने लगी। यह देखकर मांजी शीला के नजदीक सरके और उसकी सिसकती पीठ पर प्यार भरा हाथ फेर कर सांत्वना देने लगे।
मांजी ने कहा: सुख और दुःख तो धुप और छांव जैसे होते हंै। सुख के पीछे दुःख आता है, तो दुःख के पीछे सुख भी आता है। धैर्य रखो बेटी और तुझे क्या परेशानी है? तेरे दुःख की बात मुझे सुना। तेरा मन भी हलका हो जायेगा और तेरे दुःख का कोई उपाय भी मिल जायेगा।
मंाजी की बात सुनकर शीला के मन को शंाति मिली। उसने मांजी को कहा, माँ! मेरी गृहस्थी में भरपूर सूख और खुशियाँ थी। मेरे पति भी सुशील थे। भगवान की कृपा से पैसे की बात में भी हमें संतोष था। हम शंाति से गृहस्थी चलाते ईश्वर-भक्ति में अपना वक्त व्यतीत करते थें यकायक हमारा भाग्य हमसे रूठ गया। मेरे पति को बुरी दोस्ती हो गई। बुरी दोस्ती की वज से वे शराब जुआ, रेस, चरस, गंजा वगैरह खराब आदतों के शिकार हो गये और उन्होने सब कुछ गँवा दिया और हम रास्ते के भिखारी जैसे बन गये।’
यह सुनकर मांजी ने कहा: सुख के पीछे दुःख और दुःख के पीछे सुख आता ही रहता हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि ‘कर्म’ की गति न्यारी होती है।’ हर इन्सान को अपने कर्म भुगताने ही पड़ते है। इसलिये तू चिंता मत कर। अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आयेगे। तू तो मां लक्ष्मीजी की भक्त है। मां लक्ष्मीजी तो प्रेम और करूणा के अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती है। इसलिये तू धैर्य रख के मां लक्ष्मीजी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जायेगा।
मां लक्ष्मीजी का व्रत करने की बात सुनकर शीला के चेहरे पर चमक आ गई। उसने पूछा ‘मा’! लक्ष्मीजी का व्रत कैसे किया जाता है, वह मुझे समझाये। मैं यह व्रत अवश्य करूँगी।
मांजी ने कहा, बेटी! मंा लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है। उसे वरदलक्ष्मी व्रत या वैभवलक्ष्मी व्रत कहा जाता है। यह व्रत करने वाले सब मनोकामना पूर्ण होती हैं। वह सुख-संपति और यश प्राप्त करता है। ऐसा कहकर मांजी वैभवलक्ष्मी व्रत की विधि करने लगीं।
बेटी! वैभवलक्ष्मी व्रत वैसे तो सीधा-सादा व्रत है। किन्तु कई लोग यह व्रत गलत ठीक तरीके से करते है। अतः उसका फल नहीं मिलता। कई लोग कहते है कि सोने के गहने की हलदी-कुमकुम से पूजा करो। बस! व्रत हो गया। पर ऐसा नहीं है। कोई भी व्रत शास्त्रीय विधिपूर्वक करना चाहिये। तभी उसका फल मिलता सिर्फ सोने के गहने की पूजा करने से फल मिल जाता हो तो सभी आज लखपति बन गये होते। सच्ची बात यह है कि सोने के गहनों की विधि से पूजन करना चाहिये। व्रत की उद्यापन विधि भी शास्त्रीय विधि मुताबिक करनी चाहिये। तभी यह वैभवलक्ष्मी व्रत फल देता है।
यह व्रत शुक्रवार को करना चाहिये। सुबह में स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनो और सारा दिन मन में जय मां लक्ष्मी, जय मां लक्ष्मी का रटन करते रहो। किसी चुगली नहीं करनी चाहिये। शाम को पूर्व दिशा में मुँह रख सकें, इसी तरह आसन पर बैठ जाओ।
सामने पाटा रखकर उसके ऊपर रूमाल रखो। रूमाल पर चावल का छोटा सा ढेर करो। उस ढेर पर पानी से भरा तांबे का कलश रखकर, कलश पर एक कटोरी रखो। उस कटोरी मे एक सोने का गहना रखों। सोने का न हो तो चांदी का भी चलेगा। चांदी का न हो तो नकद रूपया भी चलेगा। बाद में धी का दीपक जला कर धूपसली सुलगा कर रखो।
मां लक्ष्मीजी के बहुत स्वरूप है और मां लक्ष्मीजी को श्री यंत्र अति प्रिय है। अतः वैभवलक्ष्मी में पूजन विधि करते वक्त सौ प्रथम श्री यंत्र और लक्ष्मीजी के विविध स्वरूपों का सच्चे दिल से दर्शन करो। (इस पुस्तक के अगले पृष्ठों पर ‘श्री यंत्र और माॅ लक्ष्मीजी के विविध स्वरूपों की छवि दी गई है।) उसके बार लक्ष्मी स्तवन का पाठ करो। बाद में कटोरी में रखे हुए गहने या रूपये को हल्दी-कुमकुम और चावल चढ़ाकर पूजा करो और लाल रंग का फूल चढ़ाओं। शाम को कोई मीठी चीज बना कर उसका प्रसाद रखो। न हो सके तो शक्कर या गुड़ भी चल सकता है। फिर आरती करके ग्यारह या इक्कीस शुक्रवार यह व्रत करने का दृढ संकल्प मां लक्ष्मीजी को विनती करो। फिर मां का प्रसाद बाॅट दो। और थोड़ा प्रसाद अपने लिये रखो। अगर आप में शक्ति हो तो सारा दिन उपवास रखो और सिर्फ प्रसाद खाकर शुक्रवार करो। अगर थोड़ी शक्ति भी न हो तो दो बार भोजन कर सकते हो। बादमें कटोरी मे ंरखा गंहना या रूपया ले लो। कलश का पानी तुलसी क्यारे में डाल दो और और चावल पक्षियों को डाल दो। ईसी तरह शास्त्रीय विधि अनुसार व्रत करने से उसका फल अवश्य मिलती हैं इस व्रत के प्रभाव से सब प्रकार की विपत्ति दूर होकर आदमी मालामाल हो जाता हैं। संतान न हो उसे संतान प्राप्ति होती है। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अख्ंाड रहता है। कुमारी लड़की को मनभावन पति मिलता है।
शीला यह सुनकर आनंदित हो गई। फिर पूछा: माॅ! आपने वैभवलक्ष्मी व्रत की जो शास्त्रीय विधि बताई है, वैसे मैं अवश्य करूंगी। किन्तु इसकी उद्यापन विधि किस तरह करनी चाहिये? यह भी कृपा करके सुनाइये।
मांजी ने कहा: ग्यारह या इक्कीस जो मन्नत मानी हो उतने शुक्रवार यह वैभवलक्ष्मी व्रत पूरी श्रद्धा और भावना से करना चाहिये। व्रत के आखरी शुक्रवार को जो शास्त्रीय विधि अनुसार उद्यापन विधि करनी चाहिये वह मैं तुझे बताती हूॅ। आखरी शुक्रवार को खीरया नैवैद्य रखों। पूजन विधि हर शुक्रवार करते हैं वैसे ही करनी चाहिये। पूजन विधि के बाद श्रीफल फोड़ो और कम से कम सात कुंवारी या सौभाग्यशाली स्त्रियों के कुमकुम का तिलक करके साहित्य संगम की वैभवलक्ष्मी व्रत की एक-एक पुस्तक उपहार में देनी चाहिए और अब को खीर का प्रसाद देना चाहिये। फिर धनलक्ष्मी स्वरूप, वैभवलक्ष्मी स्वरूप, माॅ लक्ष्मीजी की छवि को प्रणाम करे। माॅ लक्ष्मीजी का यह रूवरूप वैभव देने वाला है। प्रणाम करके मन ही मन भावुकता से माँ की प्रार्थना करते वक्त कहे कि हें माँ की प्रार्थना करते वक्त कि हे माॅ धनलक्ष्मी! मैंने सच्चे हृदय से आपका वैभवलक्ष्मी व्रत पूर्ण किया हैं। तो हे माॅ! हमारी (जो मनोकामना की हो वह बोलो) कि मनोकामना पूर्ण करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो उसे संतान देना। सौभाग्यशाली स्त्री का सौभाग्य अखंड रहना, कुंवारी लड़की को मनभावन पति देना। आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत जो करें उनकी सब विपत्ति दूर करना। सब को सुखी करना। हे मां! आपकी महिमा अपरंतार है।
इस तरह माॅ की प्रार्थना करके माॅ लक्ष्मीजी का धनलक्ष्मी स्वरूप को भाव से वंदन करो।
मांजी के पास वैभवलक्ष्मी व्रत की शास्त्रीय विधि सुनकर शीला भावविभोर हो उठी। उसे लगा मानो सुख का रास्ता मिल गया है उसने आँखे बन्द करके मन ही उसी क्षण संकल्प लिया कि हे वैभवलक्ष्मी माॅ! मैं भी माॅजी के कहे मुताबिक श्रद्धा से, शास्त्रीय विधि अनुसार ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ इक्कीस शुक्रवार तक करूंगी और व्रत की शास्त्रीय विधि अनुसार उद्यपान विधि करूॅगी।
शीला ने संकल्प करके आँखे खोली तो सामने कोई न था। वक्त विस्मित हो गई कि मंाजी कहाँ गयी? यह मांजी दूसरा कोई न था …………..साक्षात लक्ष्मी जी ही थी। शीला लक्ष्मीजी की भक्त थी। इसलिये अपने भक्त को रास्ता दिखाने के लिए मां लक्ष्मी देवी मांजी का स्वरूप धारण करके शीला के पास आई थी।
दूसरे दिन शुक्रवार था। सवेरे स्नान करके स्वच्छ कपडे़ पहन कर शीला मन ही मन श्रद्धा से और पूरे भाव से जय मां लक्ष्मी, जय मां लक्ष्मी का मन ही मन रटन करने लगी। सारा दिन किसी की चुगली की नहीं। शाम हुआ तब हाथ, पांव, मुंह धो कर शीला पूर्व दिशा में मुंह करके बैठी। घर में पहले सोने के बहुत से गहने थे। पर पतिदेव न गलत रास्ते पर चढ़कर सब गहने गिरवी रख दिय थे। पर नाक की चुन्नी बच गई थी। नाक की चुन्नी निकाल कर, उसे धोकर शीला ने कटोरी मंे रख दी। सामने पाटे पर रूमाल रख कर मुट्ठी भर चावल का ढेर किया। उस पर तांबे का कलश पानी भरकर रखा। उसके ऊपर चुन्नी वाली कटोरी रखी। फिर मांजी ने कही थी, व शास्त्रीय विधि अनुसार वंदन स्तवन, पूजन, वगैरह किया और घर में थोड़ी शक्कर थी, व प्रसाद में रखकर ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया।
यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। शीला को बहुत आनंद हुआ। उनके मन में वैभवलक्ष्मी व्रत के लिये श्रद्धा बढ़ गई।
शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक वैभवलक्ष्मी व्रत किया। इक्कीसवे शुक्रवार को मांजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि करके सात स्त्रियों को वैभवलक्ष्मी व्रत की सात पुस्तके उपहार मंे दी। फिर माताजी के धनलक्ष्मी स्वरूप की छवि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगी: हे माॅ धनलक्ष्मी! मैंने आपका वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी थी वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माॅ! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्रीयों का सौभाग्य अखंड रखना। कुंवारी लड़कियों को मनभावन पति देना। आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे उनकी सब विपत्ति दूर करना। सबको सुखी करना। हे माॅ! आपकी महिमा अपार है। ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के धनलक्ष्मी स्वरूप की छवि को प्रणाम किया।
इस तरह शास्त्रीय विधिपूर्वक शीला ने श्रद्धा से व्रत किया और तुरन्त ही उसे फल मिला। उसका पति गलत रास्ते पर चला गया था, वह अच्छा आदमी हो गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। मां लक्ष्मीजी के वैभवलक्ष्मी व्रत के प्रभाव से उसको ज्यादा मुनाफा होने लगा उसने तुरन्त शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिये। घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शंाति छा गई।
वैभवलक्ष्मी व्रत का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियाँ भी शास्त्रीय विधिपर्वूक वैभवलक्ष्मी व्रत करने लगी।
हे माँ धनलक्ष्मी! आप जैसे शीला पर प्रसन्न हुई, उसी तरह आपका व्रत करने वाला सब पर प्रसन्न होगा। सबको सुखा-शंाति देना। जय धनलक्ष्मी माँ ! जय वैभवलक्ष्मी माॅ।
वैभवलक्ष्मी माँ के चमत्कार
लाटरी लगी-
नवसारी से एक बहन का पत्र था।
हम बहुत गरीब थे। मेर पति अपंग और बीमार थे। दो छोटे बच्चे थे। बड़ी लड़की पोस्ट में नौकरी करती थी। उसकी तनख्वाह में से घर खर्च चल रहा था। वह पच्चीस साल की हो गई थी। इसलिये हम उसके शादी करने की फिक्र में थे।
संयोग से एक लड़का भी मिल गया। लड़की को लड़का पसंद आ गया और लड़के को लड़की पंसद आ गई। शादी की तिथि पक्की हो गई। पर एक बाधा आई। लड़के की माँ ने कहा, ‘शादी भले ही सादगी से हो जाये पर आपकी लड़की 100 ग्राम सोने के गहने ले कर आयेगी तो ही यह शादी होगी। वरना मैं सहमति नहीं दूँगी।
हमारी स्थिति चिंताजनक हो गई। मानो किनारे पर आयी नौका डूबने लगी। बचत तो थी नहीं अब 100 ग्राम सोना कहाँ से निकालें?
मैं उदास होकर दरवाजे पर खड़ी थी। तभी बाहर के रास्ते पर से एक मोटर-साइकिल तेजी से गुजर गई। उसकी ऊपर से कोई चीज सरक कर हवा में उड़ी और नीचे गिर गई। मै जिज्ञासा से बाहर निकलकर देखने लगी कि क्या गिर गया? तो वह वैभवशाली व्रत की किताब थी। मैंने साड़ी से पोछंकर उसे साफ किया और आंखो पर लगाकर बाहर ही बैठकर पढ़ने लगी।
पढ़ते-पढ़ते मुझे हुआ कि मैं भी यह वैभवलक्ष्मी व्रत करूँ तो मेरी आपत्ति भी टल जाये। लगता है माताजी ने मदद करने के लिये ही यह किताब मेरे तक पहुँचा दी होगी। मेरे मन में अदम्य श्रद्धा जाग गई।
दूसरे दिन शुक्रवार था। मैंने स्नान करके ग्यारह शुक्रवार करने की मन्नत मान कर संकल्प किया और किताब मे लिखे मुताबिक विधि अनुसार पूरे भाव और श्रद्धा से व्रत करने लगी। शुक्रवार को सारा दिन जय मां लक्ष्मी का रटन किया। शाम को चावल के ढेर पर तांबे के जल से भरा कलश रखकर, ऊपर कटोरी रखी। उसमें मेरे हाथ की सोने की अंगूठी रखी। उस किताब में लिखे अनुसार विधि पूजन करके गुड़ का प्रसाद खाया।
रात-दिन मेरा ध्यान ‘धनलक्ष्मी माॅ’ की छवि में लगा रहता। मैं रोज उनके दर्शन करके गिड़गिडाती। पांचवे शुक्रवार को शाम को मैंने धनलक्ष्मी माॅ की छवि का दर्शन करके पूजन विधि शुरू की तभी मेरा पन्द्रह साल का लड़का दौड़ता आया। उसने कहा, माॅ। हमारी महाराष्ट्र की लाॅटरी लगी। पूरे पचास हजार का इनाम लगा है, माॅ।
मैं आनन्द से उछल पड़ी। मैंने कहा, तू जरा ठहर जा! मुझे पूजन कर लेने दे। प्रसाद ग्रहण करके बात करेंगे। मैंने उमंग से व्रतविधि पूर्ण की ओर हम सबने अति श्रद्धा से माॅ का प्रसाद ग्रहण किया। बात में हम सबने लाॅटरी का नम्बर चेक किया तो उसकी बात सच थी।
माताजी ने मेरी मुसीबत दूर कर दी थी। लाॅटरी के पैसे मिलते ही उसमें से मैने 100 ग्राम सोना लेकर लड़की के लिये गहने बनवाये और लड़की की शादी की। उसे गहने देकर ससुराल भेजी।
इस तरह वैभवलक्ष्मी व्रत के प्रभाव से धनलक्ष्मी मां ने मेरा दुःख दूर कर दिया। जय धनलक्ष्मी माॅ।
खोये हुए हीरे वापस मिले
मेरे पति हीरे की दलाली करते है। हमारी आवक भी अच्छी है। अचानक एक दिन हमारे पर विपत्ति टूट पड़ी। रात्रि को मेरे पति घर आये। रोज के मुताबिक शर्ट उतारकर कील पर लटका दिया। पेन्ट बदल कर लंुगी पहनी और पेन्ट के खीसे से हीरे के पैकेट निकालने लगे तो नहीं मिले। मैंने किचन में से देखा कि वे कुछ ढूंढ रहे हैं। मैने पूछा कि क्या ढूंढ रहे हो? कुछ खो गया?
हाॅ! हीरे का पैकेट नहीं मिल रहा। पेन्ट के बायें जेब में रखा था। नहीं मिला तो हम बरबाद हो जायेगे।
मेरे भी होशोहवाश उ़ड गये। तेजी से गैस बन्द करके मैं और वे आने-जाने के रास्ते आपर्टमेन्ट की सीढि़या, रास्ता सब जगह ढूंढने लगे। पर कहीं भ पकैट दिखाई नहीं दिय।
हम दोनो पति-पत्नी उदास होकर सोफे पर बैठे गये। बहुत सुख था। अब बहुत बड़ा दुःख आ गया।
उसी समय मेरे पति के दोस्त अपनी पत्नी के साथ हमसे मिलने आये। मैंने आवस्कर देकर उनको बिठाया और पानी दिया। हमारे उदास चेहरे देखकर उन्होनें हॅसकर पूछा, क्या बात है भाई! मुॅह लटकाये क्यों बैठे हो? लड़ाई-झगड़ा हो गया है क्या?
मुझे रोना आ गया। मैंने रोते-रोते हीरे का पैकेट खो जाने की बात कही। और वे लोग भी दंग रह गये।
कुछ सोचकर दोस्त की पत्नी रमीला बहन मुझे रसोईघर में ले गई और कहा ‘भाभी! आप मेरी एक बात मानेंगी?
क्या?
आप वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानो। आदमी व्रत में भले ही न मानते हो पर हम औरतों को व्रत में श्रद्धा रखनी चाहिये। यह व्रत धनलक्ष्मी माता का है। आप मन्नत रख लो और उसने मुझे व्रत की विधि बतायी।
मैंने तुरन्त ही हाथ-पांव धोकर इक्कीस शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी और इक्यावन वैभवलक्ष्मी व्रत की किताब बाॅटने की मन्नत मानी।
सारी रात मै जय मा लक्ष्मी का रटन करती रही। सवेरे थोड़ा-थोड़ा उजाला होते ही माताजी की प्रेरणा से हम हीरे का पैकेट ढूढने निकल पड़े। जिस रास्ते से वे स्कूटर पर आये थे वही रास्ते पर मां करते-करते हम ध्यान से पैकेट ढँूढते-ढूॅढते धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। हीरा बाजार में दाखिल होते ही एक कोने पर कूडे में आधा से दबा हुए एक पैकेट पर मेरी नजर गई। मैने पति को दिखाया।
यही है! यही है! मेरे पति ने चिल्लाते हुए तेजी से पैकेट उठा लिया। हीेरे की छोटी-छोटी पुड़ी को रबड़ बैंड से जकड़ कर एक पैकेट बनाया था।, वह पैकेट वैसे का वैसा ही मिल गया।
जब शुक्रवार आया तब हम दोनो ने व्रत शुरू किया और पूरे भाव से इक्कीस शुक्रवार पूरे किये। उद्यपान विधि में हमने आपके यहाँ से इक्यावन वैभवलक्ष्मी व्रत की पुस्तकें लेकर इल्यावन स्त्रियों को उपहार में दी।
चोरी हो गये गहने वापस मिले
नीला बहन का फ्लैट का दरवाजा गलती से खुला रह गया था। उस समय ऊपर के फ्लेट मंे मिस्त्री का काम हो रहा था ईट ले जाते हुए एक मजदूर ने यह देखा। वह नीयत का अच्छा नहीं था। उसने यह मौके का फायदा उठाया और फ्लेट में घुस गया। नीला बहन स्नान करने बाथरूम में गई थी। फ्लेट में कोई न था। मजदूर तेजी से सामान ऊपर-नीचे करने लगा। अचानक बेडरूम में गद्दे के नीचे से सोने का हार, मंगलसूत्र और दो कंगन मिल गये। गहने को जेब में सरका व तेजी से बाहर निकला और फिर से ईट लाने लगा। आधे-पौने घण्टे के बाद पेट में दर्द होने का बहाना निकालकर वह भाग निकला।
नीला बहन को अच्छी कहो या बुरी यह आदत थी कि रात को गहने निकालकर गद्दे के नीचे रख देती और दूसरे दिन खाना बना कर पहन लेती। उनको तो ख्याल भी नहीं था कि गहने चोरी हो गये है। खाना बनाकर उन्होने हाथ डाला तो कुछ नहीं मिला। उन्होने तेजे से सब उलट-पुलट डाला पर गहने कहीं भी नहंी मिले। उन्होने सारा बेडरूम छान मारा। पर कुछ नहीं मिला। वे तो जोर-जोर से रोने लगी। रोने की आवाज सुनकर सब पड़ोसन दौड़ी आई और हकीकत सुनकर नीला बहन को सांत्वना देने लगी। उनका मायका पीछे की गली में ही था। कोई दौड़कर वहां खबर दे आया। उनकी मां और बहन भी दौड़ती आई।
माँ को देखकर नीला बहन फिर से सिसक-सिसक कर रोने लगी। माॅ ने कहा ‘नीला पहने हुए गहने निकालने ही नहीं चाहये। अगर निकाले तो अलमारी में रखने चाहिये। जो हुआ सो……………..तो जानती है, मुझे धनलक्ष्मी माॅ पर बहुत श्रद्धा है। उनका ग्यारह शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत कर ले। माॅ तेरी बिगड़ी सुधारेगी।
नीला बहन ने तुरन्त हाथ-पाॅव धोकर ग्यारह शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करके ग्यारह वैभवलक्ष्मी व्रत की पुस्तक उपहार में देने की मन्नत और मन ही मन जय मां लक्ष्मी का जप पूरे भाव से करने लगी।
थोडी देर में उनके पति घर पर आये। नीला बहन ने रोते-रोते सब बात बताई। पति ने कहा, रोने से कुछ नहीं होगा। चल थाने में रिपोर्ट लिखवाये।
दोनो पति-पत्नी घर बन्द करके थाने गये और पुलिस इन्सपेस्केटर को चोरी की बात कर रिपोर्ट लिखने की विनती की।
इन्सेपेक्टर रिपोर्ट लिखने लगा। नीला बहन बहने की माहिती लिखवा रही थी कि पुलिस कांस्टेबल एक मजदूर को पकड़कर वही थाने आया और बोला-
साब यह आदमी सुनार की दुकान के आगे टहल रहा था। मुझे शक हुआ और मैने इसे पकड़ लिया। तो इसकी जेब में से यह गहने निकल आये। औैैैैैैैैैैैैैैैैैर नीला बहन के ही चार गहने कांस्टेबल ने इन्सपेस्पेटकर को लिखवा रही ंथी।
इन्स्पेक्टर भी विस्मित हो गया कि रिपोर्ट लिखते-लिखते ही चोर पकड़ा गया।
उस मजदूर गुनाह कबूल कर लिया और यह भी बताया कि उसने किसी तरह और कहाॅ से यह गहने चुराये थे और नीला बहन को भी पहचान लिया। लिखापट्टी करके इन्सपेस्क्टर ने गहने नीला बहन को सौंप दिये।
इस तरह धनलक्ष्मी मां की कृपा से चोरी हो गये गहने नीला बहन को तुरन्त वापस मिल गये। नीले बहन ने ग्यारह शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करके ग्यारह वैभवलक्ष्मी व्रत की पुस्तक भाव से बांटी और अपनी मन्नत पूरी की।
ऐसी है वैभवलक्ष्मी व्रत की प्रभाव।

बिजनस अच्छा चलने लगा
भागीदारी में झगड़ा हुआ। बिजनस का बंटवारा हो गया। तभी से सुरेश के बुरे दिन शुरू हंुए। वह दिन रात मेहनत करता था। पर धंधा ठीक चल रहा था। एक ही साल में वह टूट गये उनकी पत्नी सरला बहुत सुशील थी। वह हिम्मत देती रहती । पर धंधा न चलेे तो आदमी का मन किस तरह प्रफुल्लित होगा? सरता चोरी-छुपे से कुछ न कुछ बेचकर घर चलाती थी। पति मन से और तबियत से ढीला होता जाता था। यह देखकर उनका मन व्यथित होता था।
एक बार उसकी मौसी मिलने आई। सरला की मौसी के साथ अच्छी पटती थी। उसने मौसी को सब कुछ बता दिया और रो पड़ीं
मौसी ने कहा तू वैभवलक्ष्मी व्रत की मन्नत ले और ग्यारह या इक्कीस शुक्रवार व्रत कर। अभी मेरे साथ बाजार चल और व्रत की पुस्तक खरीद ले। धनलक्ष्मी मां तेरे सब दुख दूर करेगी।
तुरन्त तैयार होकर सरला मौसी के साथ बाजार गई और साहित्य संगम की शास्त्रीय विधि वाली श्रीयंत्र और माताजी के आठ स्वरूप वाली पुस्तक खरीद ली। दूसरे दिन शुक्रवार था सरला विधिवत इक्कीस शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत की मन्नत मान कर व्रत करने लगी।
दूसरे शुक्रवार को सुरेश शाम को आया तब उसके चेहरे पर खुशी फूट रही थी। उसने कहा ‘सरल!आज तो चमत्कार हो गया। एक बहुत ही बड़ी कम्पनी को हमारे स्पेयर पार्ट्स की क्वाॅलिटी और डिजाइन जंच गई। उसने हमें बहुत बड़ा आर्डर दिया हैं लगता है हमारा नसीब बदल रहा है।
बात भी सच निकली। इक्कीस शुक्रवार पूरे होते ही सुरेश का बिजनस तेजी से बढ़ने लगा। पूरे भाव से सरलता ने व्रत की उद्यापन विधि की ओर वैभवलक्ष्मी व्रत का खरीद हुआ पुस्तक तिजोरी मंे रख दिया।
एक ही साल में सुरेश ने मारूति कार खरीदी।
ऐसा है वैभवलक्ष्मी व्रत का प्रभाव।
अच्छी नौकरी मिल गई
विमला बहन का पुत्र गजेश। एम0 काॅम0 में फस्र्ट क्लाॅस आया। घर में खुशियाॅ छा गई। दूसरे ही दिन से गंजेश ने नौकरी की खोज शुरू कर दी। एम्पलाॅयमेन्ट में नाम तो लिखा दिया था। घर वालों को लगता था कि इतने अच्छे माक्र्स हैं, नौकरी तो मिल ही जायेगी। खुश गजेश को भी ऐसा ही लगता था। किन्तु उसका अनुमान गलत निकला। गजेश के पास एल0जी0वी0जी0 की डिग्री न थी। आप समझ गये न? लागवत की डिग्री। उसके कोई चाचा-मामा अच्छी पोस्ट पर न थे।
नौकरी ढूढते-ढूॅढते एक साल में गजेश थक सा गया। मध्यम कुटुंब में बेकार रहना जीतने जी मरने बराबर था। घर में भी थोड़ी-थोड़ी चर्चा होने लगीं।
गजेश की समझ में नही आ रहा था कि क्या किया जाब?
एक दिन विमला बहन को पड़ोसन मीना बहन अपने घर बुला गई। उसने वैभवशाली व्रत किया था उसकी उद्यापन विधि कर रही थी। मीना बहन ने सात बहनों को कुमकुम का तिल कर के वैभवलक्ष्मी व्रत की एक-एक पुस्तक दी और खीर का प्रसाद दिया। सब बहुत में आपस-आपस में वैभवलक्ष्मी व्रत की महिमा की बाते हुई। थोड़ी ही देर मे ंसब अपने-अपने घर चली गई।
विमला बहन भी वैभवलक्ष्मी व्रत की किताब लेकर घर आई। घर का काम निपटा कर वे किताब देखने लगी। किताब में दिये श्रीयंत्र देखते ही उन्होने अपने मायके का वैभव याद आया। उनके पिताजी तिजोरी में श्रीयंत्र रखते थे। वे कहते थे- श्रीयंत्र लक्ष्मीजी का तांत्रित स्वरूप है। जहाॅ ‘श्रीयंत्र’ होगा वहाँ अवश्य लक्ष्मीजी का निवास होगा। विमला बहन ने भाव से श्रीयंत्र पर माथा टेका। बस! उसनके मन में हलचल होने लगी। उनको वैभवशाली व्रत करने की हृदय में पे्ररणा हुई।
उन्होने किताब के आगे देखा तो लक्ष्मीजी के विविध स्वरूप थे। उन्होंने सब पर माथा टेका। तभी उनको याद आया कि उनकी मम्मी कहती थी लक्ष्मीजी के विविध स्वरूपों के दर्शन करने से माँ लक्ष्मी प्रसन्न होती है और वह घर में निवास करती है। उनके मायके में माँ लक्ष्मीजी के विविध स्वरूप की छवियाँ थी। मम्मी रोज उनकी पूजा करती थी।ै
विमला बहन ने वैभवलक्ष्मी व्रत करने का निर्णय किया। उन्होनंे पूरी किताब पढ़कर व्रत की विधि समझ ली। तभी गजेश आया। विमला बहन ने किताब बता कर उसे भी व्रत करने की सलाह दी। गजेश को मां पर बहुत स्नेह था। वह माँ का मन रखने को हाॅ कह दी।
शुक्रवार आते ही माँ-बेटे ने साथ ही वैभवलक्ष्मी व्रत ग्यारह शुक्रवार करने की मन्नत मानी और उसी शुक्रवार से व्रत करना शुरू किया।
शनिवार किया……….. रविवार किया………… और सोमवार को गार्डन मिल से इन्टरव्यू का लेटर आया। मंगल को वह इन्टरव्यू के लिये गया। इन्टरव्यू अच्छा गया। शुक्रवार को एपाइन्टमेन्ट लेटर मिल गया। इस तरह गजेश को अच्छी नौकरी मिल गई।
घर में आनन्द छा गया।
गजेश ने दुबारा इक्कीस शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी। घनलक्ष्मी माँ की दया से गजेश को प्रमोशन मिलता ही गया और तेजी से वह बड़े ओहदे पर आ गया।
इस तरह वैभवलक्ष्मी व्रत के प्रभाव से गजेश को अच्छी नौकरी मिल गई।

सुख-समृद्धि मिले
मालती स्वभाव की सरल, होशियार, मृदुभाषी और कार्यनिपुण थी। फिर भी उन पर दुःख के पहाड़ टूटा पडे़।
दो पुत्र हुए। फिर अचानक उनके पति को स्कूटर एक्सीडेन्ट हुआ और उनके दो पाॅव कट गये। दाहिना हाथ भी क्षतिग्रस्त हो गया। समझों जान ही बच गई। घर की जवाबदारी मालती पर आ पड़ी। शादी को चार-पाँच साल ही हुए थे। इसलिये बचत भी न थीं। सिर्फ फ्लेट था………..अपना।
वह बहुत व्याकुल हो गई। किन्तु बाहर से पति को जरा सा भी लगने न दिया कि वह घबरा गई है। उसने पति को बहुत हिम्मत दी।
सुख में सुनार, दुःख में राम ………….यह कहावत अनुसार मालती को भगवान ही बचा सकते है। वह सोचने लगी कि मैं क्या करूँ तो मझुे कुछ रास्ता मिले।
अचानक उसको याद आया कि उसकी सुशीभामी कुछ तकलीफ आने पर बार-बार उद्यापन करती है। वह यह व्रत की बहुत माहिमा गाती हैं। एक उद्यापन में भाभी ने उसे भी बुलाया था और व्रत की पुस्तके दी थी।
व्रत की पुस्तक।
मालती ने अलमारी के एक कोने में रख छोड़ी थी। वह तुरन्त उठी और वह पुस्तक खोज निकाली। खोल कर उसमें छुपे हुए श्रीयंत्र, लक्ष्मीजी के विविध स्वरूप की छवियाॅ देखी। व्रत की विधि पढ़ी। व्रत की महिमा पढ़ी। उसे हुआ मैं भी यह व्रत करूँ? लक्ष्मी मां अवश्य रास्ता दिखायेगी।
और उसने वहीं बैठे-बैठे ही ग्यारह शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी और वही बैठे-बैठे ही उसने मन ही मन जय माॅ लक्ष्मी का रटन शुरू कर दिया।
शुक्रवार होते ही उसने पूरे भाव से वैभवशाली व्रत शुरू किया।
पाॅचवां शुक्रवार था। उस दिन मालती की सखी रीमा उसे मिलने आयी। वे दोनो काॅलेज में साथ-साथ पढ़ती थी। दोनो अपनी-अपनी बातें कर रही थी मालती की तकलीफंे दूर करने का एक रास्ता है। तू ब्यूटी-पार्लर शुरू कर। तूने ब्यूटी-पार्लर का कोर्स भी किया है और तू चित्रकारी भी अच्छी कर लेती हैं। तुझे तो यह सब कितना अच्छा आता है। तेरे फ्लेट में से एक रूम ब्यूटी-पार्लर का फर्नीचर-साधन सब बेचने वाले है। क्यांेकि वे फोरेन जा रहे हैं। उन्हे जल्दी है। हमारा सम्बन्ध भी बहुत घरेलू हैं। मैं तुझे कम दाम में और हाफ्ते से सब दिलवाऊंगी। ठीक है।
मालती को यह बात जॅच गई। उसने तुरन्त पति की अनुमति मांगी। पति को भी पत्नी घर में रहकर कुछ करे, उसमें कोई एतराज न था। उन्होनें अनुमति दे दी। मालती ने रीमा को कहा तू जल्दी दी मुझे ब्यूटी-पार्लर का सामान दिलवा दे। मुझे तेरी बात बहुत जॅच गई हैं काम भी होगा और पति-बच्चों का ख्याल रहेगा। सात दिन में ही मालती ने घर मंे ब्यूटी-पार्लर खोल दिया।
धनलक्ष्मी माॅ की कृपा से एक ही माह में उसका पार्लर अच्छा जम गया।
इस तरह वैभवलक्ष्मी व्रत की महिमा।
खोया हुुआ बच्चा वापस मिला
हेमा के दो लड़के थे। उसमें से दो साल को छोटा बच्चा कुंभ मेले में खो गया। उसकी बहुत खोज की। पेपर में दिया। टी0वी0 पर दिया। गाॅव-गाॅव शहर-शहर छान मारा। पर बच्चा नहीं मिला।
सारा घर शोकग्रस्त हो गया। मानों जीने का रस चला गया रात-दिन हेमा रोया करती। उनके पति भी उदास से होकर हेमा का संभालने की कोशिश मंे लगे रहते। पति-पति जैसे-तैसे समय व्यतीत करने लगे।
एक दिन वे लोग बड़े लड़के की पाठ्यपुस्तक खरीदने बाजार में गये। वहाँ पुस्तक विक्रेता की दुकान पर वैभवलक्ष्मी व्रत की किताब देखी। उसे देखते ही देखते चार-पाॅच बहने पुस्तक की सात-सात प्रतियाॅ ले गई। हेमा और उसके पति को आश्चर्य हुआ। उन्होनें भी एक किताब खरीद ली और घर पर आये।
घर पर आकर दंपति ने सारी किताब देखी-पढी।
हेमा पति को कहने लगी मैं भी यह व्रत करूँगी। मां तो दयालु है। दुनिया की रीत से सब कर देखा पर मेरा लाल नहीं मिला। अब माताजी ही हमारी आशा की ज्योत है। वे प्रसन्न होंगे तो जरूर मेरा बेटा मिल जायेगा। मैं पूरे भाव से माताजी को विनती करूँगी… मनाऊँगी। कहते-कहते हेमा की आँखों में आँसू बहने लगे।
फिर हेमा ने हाथ-पाॅव घोकर मन्नत मानीः हे धनलक्ष्मी माँ। मैं अपका वैभवलक्ष्मी व्रत इक्कीस शुक्रवार करूँगीं। भाव से करूंगी। और आपकी 101 किताबें बाटूँगी। पर माॅ मुझे में खोये हुए लाल से मिला दो। ऐसा संकल्प करके हेमा गिडगिड़ाने लगी।
बच्चे के खो जाने पर दोनो पति-पत्नी जरूरत हो उतना ही बोलते। समझों, मौन ही रहते। अतः हेमा निन्तर जय माॅ लक्ष्मी का रटन करने लगी।
शुक्रवार आते ही उसने पूरे भाव-भक्ति से वैभवलक्ष्मी व्रत शास्त्रीय विधि से करने शुरूआत की। घर में एक साल से कोई मीठी चीज बनायी ही नहीं थी। पर शुक्रवार को थोड़ा गुड़ का शीरा बनाकर माताजी को प्रसाद रखा।
व्रत करके वह जय माॅ लक्ष्मी की रटन करते-करते सो गई।
भोर होने से पहले हेमा को सपने में रंग-बिरंगी फब्बारे वाला बाग दिखाई दिया। वह बाग में उसका हुआ बच्चा खेल रहा था। तुरन्त उसकी ख्ुाल गई।
सवेेरे उठते ही उसने स्नान करके धूप-दीप किया और धनलक्ष्मी माॅ की छबि को लक्ष्मीजी के विविध स्वरूपों को ओर श्रीयंत्र को वंदन करके माथा टेका। फिर लक्ष्मी स्तवन किया। बाद में माताजी के सपने की बात कही। माताजी के मंदिर में जाकर श्रीफल रखा और वहाँ भी सपने की बात कही। बाद में घर आकर पति को सपने की बात कही।
उसके पति ने कहा, तू जो बाग का वर्णन करती है, वह मैसूर का वृन्दावन गार्डन लगता है। मैं एक बार वहाॅ गया था।
तो चलों हम वही जाकर मेरे लाडले को ढूँढेंगे। मेरा मन कहता है माताजी ने ही हमें सपने द्वारा संकेत दिया है।
पति ने स्वीकृति दी। बड़े बेटे को ननद के घर रखकर हेमा पति के साथ उसी दिन मैसूर जाने के लिए निकल पड़ी। मैसूर पहुँचते ही दोनो वृन्दावन गार्डन में गये और व्याकुलता से अपने बच्चें को ढॅूढने लगे। मन में जय माॅ लक्ष्मी का रटन चालू था और चमत्कार हुआ। सपने मे ंहेमा जिस जगह बेटे को देखा था, वही जगह पर उसका बेटा उसके हम उम्र बच्चे के साथ खेल रहा था। उन दोनो बच्चों के नजदीक एक दंपति बैठे थे। वे चेहरे से मद्रासी लगते थे।
हेमा ने दौड़कर अपने बच्चे को गोद में उठा लिया और छाती से चिपका कर रोने लगी। उसका बेटा भी घबराकर रोने लगा। वह मद्रासी दंपति भी स्तब्ध बन कर खड़े हो गये। हेमा के पति ने हेमा को सांत्वना देकर चुप कराया। फिर वह मद्रासी दम्पति भी स्तब्ध बन कर खड़े हो गये। हेमा के पति ने हेमा को सांत्वना देकर चुप कराया। फिर वह मद्रासी दम्पति को बताया कि यह बच्चा उसका है वह कहाँ खो गया था, उसे किस-किस रीत से ढूँढा और पेपर के कटिंग भी दिखाये।
मद्रासी दम्पति ने भी कहा कि यह बच्चा वे लोग कंुभ स्नान करने गये थे तब ट्रेन में से मिला था। बच्चा टेªन में किस तरह आया वह उनको मालूम नहीं था। पर बच्चा बहुत रोता था। अतः वे लोग उसे अपने साथ मैसूर ले आये और अपने बच्चे की तरह पालते थे।
फिर जरूरी कार्यवाही करके, मद्रासी दंपति को बहुत-बहुत धन्यवाद देकर हेमा और उनका पति अपने बेटे को घर ले आये। घर में फिर से सुख का सागर लहराने लगा।
हेमा हर शुक्रवार शाम को कुछ ने कुछ मीठा बनाकर माताजी को प्रसाद रखती। इस तरह इक्कीस शुक्रवार पूर्ण होते ही उसने भाव से उद्यपान किया और एक सौ एक वैभवलक्ष्मी व्रत की किताबे बाॅटी।
हेमा के पड़ोसी वगैरह सब माताजी के व्रत का यह चमत्कार देखकर दंग रह गये।
ऐसा है वैभवलक्ष्मी व्रत का प्रभाव।
लड़की की शादी हुई
रााधा बहन की सुनार जाति में ज्यादातर स्त्रियां गौरवर्ण की और रूपवान। पर राधाबहन की बेटी सेनाली थोड़ी श्याम थी। ऊपर से पति की स्थिति भी साधारण। बड़ा दहेज देने की शक्ति उसमें न थी। सोनाली गे्रजूएट हो गई थी पर उसकी शादी नहीं हो रही थी।
धीरे-धीरे आयु बढ़ने लगी। अतः माता-पिता की चिंता भी बढ़ने लगी। सोनाली खाना पकाने में और इतर प्रवृत्तियों में कुशल थी। स्वभाव से भी सयानी थी। पर शादी की बात में पीछे रह गई।
एक दिन सोनाली अपने काॅलेज फ्रेन्ड हिना से मिलने गई तो हिना एक किताब पढ़ रही थी। सोनाली ने पूछा हिना क्या पढ़ा रही है?
वैभवलक्ष्मी व्रत की किताब हैं हमारी पड़ोसन लीलाबहन ने आज उद्यापन किया है। तो सब को एक-एक किताब बाॅटी थीं।
मुझे दिखा?
हिना से सोनाली को किताब दी। किताब पढ़ते-पढ़ते सोनाली को हुआ मैं भी यह व्रत करके देखूॅ। शायद मेरी शादी हो जाय।
सोनाली ने कहा हिना यह किताब में जाऊँ?
क्यो? व्रत करने का विचार है? हेमा ने हँसकर पूछा।
हाँ!उमर बढ़नी जाती है और दिल बैठा-सा जाता है।
तेरी बात सच्ची है। यह किताब तू ले जा।
शुक्रवार को सवेरे 11 शुक्रवार की मन्नत मानकर सोनाली ने वैभवलक्ष्मी व्रत करने का संकल्प किया और व्रत शुरू किया।
उसी रात उनके फुफाजी एक लड़के की बात लेकर आये। जाति में ख्यातनाम घराना …………….धनवान ……….. लड़का एम0एस0सी0 पास थी। सोनाली की फुफी ने सीधे लड़के के साथ ही बात चला कर सोनाली के गुण गाये थे। वह लड़का शांत स्वभाव की और होशियार लड़की के साथ सादी करने का इच्छुक था। जो उसके व्यापार में हाथ बॅटा सके।
सोनाली तो यह बात सुनकर खुश-खुश हो गई।
अगले शुक्रवार को ही सादगी से सोनाली की शादी हो गई।
ऐसी ही माॅ धनलक्ष्मी की कृपा। वैभवलक्ष्मी व्रत का चमत्कार।
श्री महालक्ष्मी की स्तुति
महादेवी महालक्ष्मी नमस्ते त्वं विष्णु प्रिये।
शक्तिदायी महालक्ष्मी नमस्ते दुःख भंजनि।। (1)
श्रेया प्राप्ति निमित्ताय महालक्ष्मी नमाम्यहम।
पतितो द्धारीणि देवी नमाम्यहं पुनः पुनः (2)
देवांस्तवा संस्तुवन्ति ही शास्त्राणि च मुर्हुमः।
देवास्त्वां प्रणमन्तिही लक्ष्मीदेवी नमोडस्तुते। । (3)
नमस्ते महालक्ष्मी नमस्ते भवभंजनी।
भुक्मिुक्ति न लभ्यते महादेवी त्ययि कृपा बिना।।(4)
सुख सौभाग्यं न प्रात्नोति पुत्र लक्ष्मी न विधते।
न तत्पफलं समात्नोति महालक्ष्मी नमाम्यहम।। (5)
देहि सौभाग्यमारोग्य देहिमें परमं सुखम्।
नमस्ते आद्यशक्ति त्वं नमस्ते भीड़भंजनी।।(6)
विधेहि देवी कल्याण विधेहि परमां श्रियम।
विधावन्त यशस्वन्तं लक्ष्मवन्त जन कुरू।।(7)
अचिन्त्य रूप-चरितें सर्वशत्रु विनाशीनी।
नमस्तेतु महामाया सर्व सुख प्रदायिनी।।(8)
नमात्यंह महालक्ष्मी नमाम्यहम सुरेश्रवरी ।
नमात्यहं जगद्धात्री नमाम्यंह परमेश्वरी।।(9)
श्री लक्ष्मी महिमा
श्री वैभवलक्ष्मी व्रत मंे आरती करने के बाद यह श्लोक का पठन करने से शीध्र फल मिलता है।
यत्राभ्यागवदानमान चर पक्षालनं भोजन।
सत्सेवा पितृदेववार्चन विधिः सत्यंगवां पालनम्।।
धान्या नामपि सग्रहो न कलहश्चित्ता तृरूपा प्रिया।
दृष्टा प्रहा हरि वसमि कमला तस्मिन गृहे निष्पफला।।
भावार्थ
जहाॅ मेहमान की आव-भगत करने में आती है………… उनको भोजन कराया जाता है, जहाॅ सज्जनों की सेवा की जाती है, जहाॅ निरन्तर भाव से भगवान की पूजा और धन्य धर्मकार्य किये जाते हैं। जहाॅ सत्य का पालन किया जाता है, जहाॅ गलत कार्य नहीं होते, जहाॅ गायों की रक्षा होती है जहाॅ दान देने के लिये धान्य का संग्रह किया जाता है, जहाॅ पत्नी संतोषी और विनयी होती है, ऐसी जगह पर मैं सदा निश्चल रहती हॅू। इनके सिवा की जगह पर कभी कभार दृष्टि डालती हॅू।

आरती भगवती महालक्ष्मी जी की!
ओउम् जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हर विष्णु विधाता।।
उमा रमा ब्रहमाणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता।
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पति दाता।
जो कोई तुमको ध्याता, ऋद्धि-सिद्धि पाता।
तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभ दाता।
कर्म-प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की त्राता।।
जिस घर में तुम रहती, सब सद्गुण आता।
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता।।
तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता ।।
शुभगुण मंदिर सुुंदर, श्रीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहीं पाता।।
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता।
उर आनंद समाता, पाप उतर जाता ।
बोलो भगवती महालक्ष्मी की जय।।