वैभवलक्ष्मी माँ के चमत्कार

वैभवलक्ष्मी माँ के चमत्कार

लाटरी लगी-

नवसारी से एक बहन का पत्र था।

हम बहुत गरीब थे। मेर पति अपंग और बीमार थे। दो छोटे बच्चे थे। बड़ी लड़की पोस्ट में नौकरी करती थी। उसकी तनख्वाह में से घर खर्च चल रहा था। वह पच्चीस साल की हो गई थी। इसलिये हम उसके शादी करने की फिक्र में थे।

संयोग से एक लड़का भी मिल गया। लड़की को लड़का पसंद आ गया और लड़के को लड़की पंसद आ गई। शादी की तिथि पक्की हो गई। पर एक बाधा आई। लड़के की माँ ने कहा, ‘शादी भले ही सादगी से हो जाये पर आपकी लड़की 100 ग्राम सोने के गहने ले कर आयेगी तो ही यह शादी होगी। वरना मैं सहमति नहीं दूँगी।

हमारी स्थिति चिंताजनक हो गई। मानो किनारे पर आयी नौका डूबने लगी। बचत तो थी नहीं अब 100 ग्राम सोना कहाँ से निकालें?

मैं उदास होकर दरवाजे पर खड़ी थी। तभी बाहर के रास्ते पर से एक मोटर-साइकिल तेजी से गुजर गई। उसकी ऊपर से कोई चीज सरक कर हवा में उड़ी और नीचे गिर गई। मै जिज्ञासा से बाहर निकलकर देखने लगी कि क्या गिर गया? तो वह वैभवशाली व्रत की किताब थी। मैंने साड़ी से पोछंकर उसे साफ किया और आंखो पर लगाकर बाहर ही बैठकर पढ़ने लगी।
पढ़ते-पढ़ते मुझे हुआ कि मैं भी यह वैभवलक्ष्मी व्रत करूँ तो मेरी आपत्ति भी टल जाये। लगता है माताजी ने मदद करने के लिये ही यह किताब मेरे तक पहुँचा दी होगी। मेरे मन में अदम्य श्रद्धा जाग गई।

दूसरे दिन शुक्रवार था। मैंने स्नान करके ग्यारह शुक्रवार करने की मन्नत मान कर संकल्प किया और किताब मे लिखे मुताबिक विधि अनुसार पूरे भाव और श्रद्धा से व्रत करने लगी। शुक्रवार को सारा दिन जय मां लक्ष्मी का रटन किया। शाम को चावल के ढेर पर तांबे के जल से भरा कलश रखकर, ऊपर कटोरी रखी। उसमें मेरे हाथ की सोने की अंगूठी रखी। उस किताब में लिखे अनुसार विधि पूजन करके गुड़ का प्रसाद खाया।

रात-दिन मेरा ध्यान ‘धनलक्ष्मी माॅ’ की छवि में लगा रहता। मैं रोज उनके दर्शन करके गिड़गिडाती। पांचवे शुक्रवार को शाम को मैंने धनलक्ष्मी माॅ की छवि का दर्शन करके पूजन विधि शुरू की तभी मेरा पन्द्रह साल का लड़का दौड़ता आया। उसने कहा, माॅ। हमारी महाराष्ट्र की लाॅटरी लगी। पूरे पचास हजार का इनाम लगा है, माॅ।

मैं आनन्द से उछल पड़ी। मैंने कहा, तू जरा ठहर जा! मुझे पूजन कर लेने दे। प्रसाद ग्रहण करके बात करेंगे। मैंने उमंग से व्रतविधि पूर्ण की ओर हम सबने अति श्रद्धा से माॅ का प्रसाद ग्रहण किया। बात में हम सबने लाॅटरी का नम्बर चेक किया तो उसकी बात सच थी।

माताजी ने मेरी मुसीबत दूर कर दी थी। लाॅटरी के पैसे मिलते ही उसमें से मैने 100 ग्राम सोना लेकर लड़की के लिये गहने बनवाये और लड़की की शादी की। उसे गहने देकर ससुराल भेजी।

इस तरह वैभवलक्ष्मी व्रत के प्रभाव से धनलक्ष्मी मां ने मेरा दुःख दूर कर दिया। जय धनलक्ष्मी माॅ।

खोये हुए हीरे वापस मिले

मेरे पति हीरे की दलाली करते है। हमारी आवक भी अच्छी है। अचानक एक दिन हमारे पर विपत्ति टूट पड़ी। रात्रि को मेरे पति घर आये। रोज के मुताबिक शर्ट उतारकर कील पर लटका दिया। पेन्ट बदल कर लंुगी पहनी और पेन्ट के खीसे से हीरे के पैकेट निकालने लगे तो नहीं मिले। मैंने किचन में से देखा कि वे कुछ ढूंढ रहे हैं। मैने पूछा कि क्या ढूंढ रहे हो? कुछ खो गया?

हाॅ! हीरे का पैकेट नहीं मिल रहा। पेन्ट के बायें जेब में रखा था। नहीं मिला तो हम बरबाद हो जायेगे।

मेरे भी होशोहवाश उ़ड गये। तेजी से गैस बन्द करके मैं और वे आने-जाने के रास्ते आपर्टमेन्ट की सीढि़या, रास्ता सब जगह ढूंढने लगे। पर कहीं भ पकैट दिखाई नहीं दिय।

हम दोनो पति-पत्नी उदास होकर सोफे पर बैठे गये। बहुत सुख था। अब बहुत बड़ा दुःख आ गया।

उसी समय मेरे पति के दोस्त अपनी पत्नी के साथ हमसे मिलने आये। मैंने आवस्कर देकर उनको बिठाया और पानी दिया। हमारे उदास चेहरे देखकर उन्होनें हॅसकर पूछा, क्या बात है भाई! मुॅह लटकाये क्यों बैठे हो? लड़ाई-झगड़ा हो गया है क्या?

मुझे रोना आ गया। मैंने रोते-रोते हीरे का पैकेट खो जाने की बात कही। और वे लोग भी दंग रह गये।

कुछ सोचकर दोस्त की पत्नी रमीला बहन मुझे रसोईघर में ले गई और कहा ‘भाभी! आप मेरी एक बात मानेंगी?

क्या?

आप वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानो। आदमी व्रत में भले ही न मानते हो पर हम औरतों को व्रत में श्रद्धा रखनी चाहिये। यह व्रत धनलक्ष्मी माता का है। आप मन्नत रख लो और उसने मुझे व्रत की विधि बतायी।

मैंने तुरन्त ही हाथ-पांव धोकर इक्कीस शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी और इक्यावन वैभवलक्ष्मी व्रत की किताब बाॅटने की मन्नत मानी।

सारी रात मै जय मा लक्ष्मी का रटन करती रही। सवेरे थोड़ा-थोड़ा उजाला होते ही माताजी की प्रेरणा से हम हीरे का पैकेट ढूढने निकल पड़े। जिस रास्ते से वे स्कूटर पर आये थे वही रास्ते पर मां करते-करते हम ध्यान से पैकेट ढँूढते-ढूॅढते धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। हीरा बाजार में दाखिल होते ही एक कोने पर कूडे में आधा से दबा हुए एक पैकेट पर मेरी नजर गई। मैने पति को दिखाया।

यही है! यही है! मेरे पति ने चिल्लाते हुए तेजी से पैकेट उठा लिया। हीेरे की छोटी-छोटी पुड़ी को रबड़ बैंड से जकड़ कर एक पैकेट बनाया था।, वह पैकेट वैसे का वैसा ही मिल गया।

जब शुक्रवार आया तब हम दोनो ने व्रत शुरू किया और पूरे भाव से इक्कीस शुक्रवार पूरे किये। उद्यपान विधि में हमने आपके यहाँ से इक्यावन वैभवलक्ष्मी व्रत की पुस्तकें लेकर इल्यावन स्त्रियों को उपहार में दी।

चोरी हो गये गहने वापस मिले

नीला बहन का फ्लैट का दरवाजा गलती से खुला रह गया था। उस समय ऊपर के फ्लेट मंे मिस्त्री का काम हो रहा था ईट ले जाते हुए एक मजदूर ने यह देखा। वह नीयत का अच्छा नहीं था। उसने यह मौके का फायदा उठाया और फ्लेट में घुस गया। नीला बहन स्नान करने बाथरूम में गई थी। फ्लेट में कोई न था। मजदूर तेजी से सामान ऊपर-नीचे करने लगा। अचानक बेडरूम में गद्दे के नीचे से सोने का हार, मंगलसूत्र और दो कंगन मिल गये। गहने को जेब में सरका व तेजी से बाहर निकला और फिर से ईट लाने लगा। आधे-पौने घण्टे के बाद पेट में दर्द होने का बहाना निकालकर वह भाग निकला।

नीला बहन को अच्छी कहो या बुरी यह आदत थी कि रात को गहने निकालकर गद्दे के नीचे रख देती और दूसरे दिन खाना बना कर पहन लेती। उनको तो ख्याल भी नहीं था कि गहने चोरी हो गये है। खाना बनाकर उन्होने हाथ डाला तो कुछ नहीं मिला। उन्होने तेजे से सब उलट-पुलट डाला पर गहने कहीं भी नहंी मिले। उन्होने सारा बेडरूम छान मारा। पर कुछ नहीं मिला। वे तो जोर-जोर से रोने लगी। रोने की आवाज सुनकर सब पड़ोसन दौड़ी आई और हकीकत सुनकर नीला बहन को सांत्वना देने लगी। उनका मायका पीछे की गली में ही था। कोई दौड़कर वहां खबर दे आया। उनकी मां और बहन भी दौड़ती आई।

माँ को देखकर नीला बहन फिर से सिसक-सिसक कर रोने लगी। माॅ ने कहा ‘नीला पहने हुए गहने निकालने ही नहीं चाहये। अगर निकाले तो अलमारी में रखने चाहिये। जो हुआ सो……………..तो जानती है, मुझे धनलक्ष्मी माॅ पर बहुत श्रद्धा है। उनका ग्यारह शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत कर ले। माॅ तेरी बिगड़ी सुधारेगी।

नीला बहन ने तुरन्त हाथ-पाॅव धोकर ग्यारह शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करके ग्यारह वैभवलक्ष्मी व्रत की पुस्तक उपहार में देने की मन्नत और मन ही मन जय मां लक्ष्मी का जप पूरे भाव से करने लगी।

थोडी देर में उनके पति घर पर आये। नीला बहन ने रोते-रोते सब बात बताई। पति ने कहा, रोने से कुछ नहीं होगा। चल थाने में रिपोर्ट लिखवाये।

दोनो पति-पत्नी घर बन्द करके थाने गये और पुलिस इन्सपेस्केटर को चोरी की बात कर रिपोर्ट लिखने की विनती की।

इन्सेपेक्टर रिपोर्ट लिखने लगा। नीला बहन बहने की माहिती लिखवा रही थी कि पुलिस कांस्टेबल एक मजदूर को पकड़कर वही थाने आया और बोला-

साब यह आदमी सुनार की दुकान के आगे टहल रहा था। मुझे शक हुआ और मैने इसे पकड़ लिया। तो इसकी जेब में से यह गहने निकल आये। औैैैैैैैैैैैैैैैैैर नीला बहन के ही चार गहने कांस्टेबल ने इन्सपेस्पेटकर को लिखवा रही ंथी।

इन्स्पेक्टर भी विस्मित हो गया कि रिपोर्ट लिखते-लिखते ही चोर पकड़ा गया।

उस मजदूर गुनाह कबूल कर लिया और यह भी बताया कि उसने किसी तरह और कहाॅ से यह गहने चुराये थे और नीला बहन को भी पहचान लिया। लिखापट्टी करके इन्सपेस्क्टर ने गहने नीला बहन को सौंप दिये।

इस तरह धनलक्ष्मी मां की कृपा से चोरी हो गये गहने नीला बहन को तुरन्त वापस मिल गये। नीले बहन ने ग्यारह शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करके ग्यारह वैभवलक्ष्मी व्रत की पुस्तक भाव से बांटी और अपनी मन्नत पूरी की।

ऐसी है वैभवलक्ष्मी व्रत की प्रभाव।

बिजनस अच्छा चलने लगा

भागीदारी में झगड़ा हुआ। बिजनस का बंटवारा हो गया। तभी से सुरेश के बुरे दिन शुरू हंुए। वह दिन रात मेहनत करता था। पर धंधा ठीक चल रहा था। एक ही साल में वह टूट गये उनकी पत्नी सरला बहुत सुशील थी। वह हिम्मत देती रहती । पर धंधा न चलेे तो आदमी का मन किस तरह प्रफुल्लित होगा? सरता चोरी-छुपे से कुछ न कुछ बेचकर घर चलाती थी। पति मन से और तबियत से ढीला होता जाता था। यह देखकर उनका मन व्यथित होता था।

एक बार उसकी मौसी मिलने आई। सरला की मौसी के साथ अच्छी पटती थी। उसने मौसी को सब कुछ बता दिया और रो पड़ीं ।

मौसी ने कहा तू वैभवलक्ष्मी व्रत की मन्नत ले और ग्यारह या इक्कीस शुक्रवार व्रत कर। अभी मेरे साथ बाजार चल और व्रत की पुस्तक खरीद ले। धनलक्ष्मी मां तेरे सब दुख दूर करेगी।

तुरन्त तैयार होकर सरला मौसी के साथ बाजार गई और साहित्य संगम की शास्त्रीय विधि वाली श्रीयंत्र और माताजी के आठ स्वरूप वाली पुस्तक खरीद ली। दूसरे दिन शुक्रवार था सरला विधिवत इक्कीस शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत की मन्नत मान कर व्रत करने लगी।

दूसरे शुक्रवार को सुरेश शाम को आया तब उसके चेहरे पर खुशी फूट रही थी। उसने कहा ‘सरल!आज तो चमत्कार हो गया। एक बहुत ही बड़ी कम्पनी को हमारे स्पेयर पार्ट्स की क्वाॅलिटी और डिजाइन जंच गई। उसने हमें बहुत बड़ा आर्डर दिया हैं लगता है हमारा नसीब बदल रहा है।

बात भी सच निकली। इक्कीस शुक्रवार पूरे होते ही सुरेश का बिजनस तेजी से बढ़ने लगा। पूरे भाव से सरलता ने व्रत की उद्यापन विधि की ओर वैभवलक्ष्मी व्रत का खरीद हुआ पुस्तक तिजोरी मंे रख दिया।

एक ही साल में सुरेश ने मारूति कार खरीदी।

ऐसा है वैभवलक्ष्मी व्रत का प्रभाव।

अच्छी नौकरी मिल गई

विमला बहन का पुत्र गजेश। एम0 काॅम0 में फस्र्ट क्लाॅस आया। घर में खुशियाॅ छा गई। दूसरे ही दिन से गंजेश ने नौकरी की खोज शुरू कर दी। एम्पलाॅयमेन्ट में नाम तो लिखा दिया था। घर वालों को लगता था कि इतने अच्छे माक्र्स हैं, नौकरी तो मिल ही जायेगी। खुश गजेश को भी ऐसा ही लगता था। किन्तु उसका अनुमान गलत निकला। गजेश के पास एल0जी0वी0जी0 की डिग्री न थी। आप समझ गये न? लागवत की डिग्री। उसके कोई चाचा-मामा अच्छी पोस्ट पर न थे।

नौकरी ढूढते-ढूॅढते एक साल में गजेश थक सा गया। मध्यम कुटुंब में बेकार रहना जीतने जी मरने बराबर था। घर में भी थोड़ी-थोड़ी चर्चा होने लगीं।

गजेश की समझ में नही आ रहा था कि क्या किया जाब?

एक दिन विमला बहन को पड़ोसन मीना बहन अपने घर बुला गई। उसने वैभवशाली व्रत किया था उसकी उद्यापन विधि कर रही थी। मीना बहन ने सात बहनों को कुमकुम का तिल कर के वैभवलक्ष्मी व्रत की एक-एक पुस्तक दी और खीर का प्रसाद दिया। सब बहुत में आपस-आपस में वैभवलक्ष्मी व्रत की महिमा की बाते हुई। थोड़ी ही देर मे ंसब अपने-अपने घर चली गई।

विमला बहन भी वैभवलक्ष्मी व्रत की किताब लेकर घर आई। घर का काम निपटा कर वे किताब देखने लगी। किताब में दिये श्रीयंत्र देखते ही उन्होने अपने मायके का वैभव याद आया। उनके पिताजी तिजोरी में श्रीयंत्र रखते थे। वे कहते थे- श्रीयंत्र लक्ष्मीजी का तांत्रित स्वरूप है। जहाॅ ‘श्रीयंत्र’ होगा वहाँ अवश्य लक्ष्मीजी का निवास होगा। विमला बहन ने भाव से श्रीयंत्र पर माथा टेका। बस! उसनके मन में हलचल होने लगी। उनको वैभवशाली व्रत करने की हृदय में पे्ररणा हुई।

उन्होने किताब के आगे देखा तो लक्ष्मीजी के विविध स्वरूप थे। उन्होंने सब पर माथा टेका। तभी उनको याद आया कि उनकी मम्मी कहती थी लक्ष्मीजी के विविध स्वरूपों के दर्शन करने से माँ लक्ष्मी प्रसन्न होती है और वह घर में निवास करती है। उनके मायके में माँ लक्ष्मीजी के विविध स्वरूप की छवियाँ थी। मम्मी रोज उनकी पूजा करती थी।ै

विमला बहन ने वैभवलक्ष्मी व्रत करने का निर्णय किया। उन्होनंे पूरी किताब पढ़कर व्रत की विधि समझ ली। तभी गजेश आया। विमला बहन ने किताब बता कर उसे भी व्रत करने की सलाह दी। गजेश को मां पर बहुत स्नेह था। वह माँ का मन रखने को हाॅ कह दी।

शुक्रवार आते ही माँ-बेटे ने साथ ही वैभवलक्ष्मी व्रत ग्यारह शुक्रवार करने की मन्नत मानी और उसी शुक्रवार से व्रत करना शुरू किया।

शनिवार किया……….. रविवार किया………… और सोमवार को गार्डन मिल से इन्टरव्यू का लेटर आया। मंगल को वह इन्टरव्यू के लिये गया। इन्टरव्यू अच्छा गया। शुक्रवार को एपाइन्टमेन्ट लेटर मिल गया। इस तरह गजेश को अच्छी नौकरी मिल गई।

घर में आनन्द छा गया।

गजेश ने दुबारा इक्कीस शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी। घनलक्ष्मी माँ की दया से गजेश को प्रमोशन मिलता ही गया और तेजी से वह बड़े ओहदे पर आ गया।

इस तरह वैभवलक्ष्मी व्रत के प्रभाव से गजेश को अच्छी नौकरी मिल गई।

सुख-समृद्धि मिले

मालती स्वभाव की सरल, होशियार, मृदुभाषी और कार्यनिपुण थी। फिर भी उन पर दुःख के पहाड़ टूटा पडे़।

दो पुत्र हुए। फिर अचानक उनके पति को स्कूटर एक्सीडेन्ट हुआ और उनके दो पाॅव कट गये। दाहिना हाथ भी क्षतिग्रस्त हो गया। समझों जान ही बच गई। घर की जवाबदारी मालती पर आ पड़ी। शादी को चार-पाँच साल ही हुए थे। इसलिये बचत भी न थीं। सिर्फ फ्लेट था………..अपना।

वह बहुत व्याकुल हो गई। किन्तु बाहर से पति को जरा सा भी लगने न दिया कि वह घबरा गई है। उसने पति को बहुत हिम्मत दी।

सुख में सुनार, दुःख में राम ………….यह कहावत अनुसार मालती को भगवान ही बचा सकते है। वह सोचने लगी कि मैं क्या करूँ तो मझुे कुछ रास्ता मिले।

अचानक उसको याद आया कि उसकी सुशीभामी कुछ तकलीफ आने पर बार-बार उद्यापन करती है। वह यह व्रत की बहुत माहिमा गाती हैं। एक उद्यापन में भाभी ने उसे भी बुलाया था और व्रत की पुस्तके दी थी।

व्रत की पुस्तक।

मालती ने अलमारी के एक कोने में रख छोड़ी थी। वह तुरन्त उठी और वह पुस्तक खोज निकाली। खोल कर उसमें छुपे हुए श्रीयंत्र, लक्ष्मीजी के विविध स्वरूप की छवियाॅ देखी। व्रत की विधि पढ़ी। व्रत की महिमा पढ़ी। उसे हुआ मैं भी यह व्रत करूँ? लक्ष्मी मां अवश्य रास्ता दिखायेगी।

और उसने वहीं बैठे-बैठे ही ग्यारह शुक्रवार वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी और वही बैठे-बैठे ही उसने मन ही मन जय माॅ लक्ष्मी का रटन शुरू कर दिया।

शुक्रवार होते ही उसने पूरे भाव से वैभवशाली व्रत शुरू किया।

पाॅचवां शुक्रवार था। उस दिन मालती की सखी रीमा उसे मिलने आयी। वे दोनो काॅलेज में साथ-साथ पढ़ती थी। दोनो अपनी-अपनी बातें कर रही थी मालती की तकलीफंे दूर करने का एक रास्ता है। तू ब्यूटी-पार्लर शुरू कर। तूने ब्यूटी-पार्लर का कोर्स भी किया है और तू चित्रकारी भी अच्छी कर लेती हैं। तुझे तो यह सब कितना अच्छा आता है। तेरे फ्लेट में से एक रूम ब्यूटी-पार्लर का फर्नीचर-साधन सब बेचने वाले है। क्यांेकि वे फोरेन जा रहे हैं। उन्हे जल्दी है। हमारा सम्बन्ध भी बहुत घरेलू हैं। मैं तुझे कम दाम में और हाफ्ते से सब दिलवाऊंगी। ठीक है।

मालती को यह बात जॅच गई। उसने तुरन्त पति की अनुमति मांगी। पति को भी पत्नी घर में रहकर कुछ करे, उसमें कोई एतराज न था। उन्होनें अनुमति दे दी। मालती ने रीमा को कहा तू जल्दी दी मुझे ब्यूटी-पार्लर का सामान दिलवा दे। मुझे तेरी बात बहुत जॅच गई हैं काम भी होगा और पति-बच्चों का ख्याल रहेगा। सात दिन में ही मालती ने घर मंे ब्यूटी-पार्लर खोल दिया।

धनलक्ष्मी माॅ की कृपा से एक ही माह में उसका पार्लर अच्छा जम गया।

इस तरह वैभवलक्ष्मी व्रत की महिमा।

खोया हुुआ बच्चा वापस मिला

हेमा के दो लड़के थे। उसमें से दो साल को छोटा बच्चा कुंभ मेले में खो गया। उसकी बहुत खोज की। पेपर में दिया। टी0वी0 पर दिया। गाॅव-गाॅव शहर-शहर छान मारा। पर बच्चा नहीं मिला।

सारा घर शोकग्रस्त हो गया। मानों जीने का रस चला गया रात-दिन हेमा रोया करती। उनके पति भी उदास से होकर हेमा का संभालने की कोशिश मंे लगे रहते। पति-पति जैसे-तैसे समय व्यतीत करने लगे।

एक दिन वे लोग बड़े लड़के की पाठ्यपुस्तक खरीदने बाजार में गये। वहाँ पुस्तक विक्रेता की दुकान पर वैभवलक्ष्मी व्रत की किताब देखी। उसे देखते ही देखते चार-पाॅच बहने पुस्तक की सात-सात प्रतियाॅ ले गई। हेमा और उसके पति को आश्चर्य हुआ। उन्होनें भी एक किताब खरीद ली और घर पर आये।

घर पर आकर दंपति ने सारी किताब देखी-पढी।

हेमा पति को कहने लगी मैं भी यह व्रत करूँगी। मां तो दयालु है। दुनिया की रीत से सब कर देखा पर मेरा लाल नहीं मिला। अब माताजी ही हमारी आशा की ज्योत है। वे प्रसन्न होंगे तो जरूर मेरा बेटा मिल जायेगा। मैं पूरे भाव से माताजी को विनती करूँगी… मनाऊँगी। कहते-कहते हेमा की आँखों में आँसू बहने लगे।

फिर हेमा ने हाथ-पाॅव घोकर मन्नत मानीः हे धनलक्ष्मी माँ। मैं अपका वैभवलक्ष्मी व्रत इक्कीस शुक्रवार करूँगीं। भाव से करूंगी। और आपकी 101 किताबें बाटूँगी। पर माॅ मुझे में खोये हुए लाल से मिला दो। ऐसा संकल्प करके हेमा गिडगिड़ाने लगी।

बच्चे के खो जाने पर दोनो पति-पत्नी जरूरत हो उतना ही बोलते। समझों, मौन ही रहते। अतः हेमा निन्तर जय माॅ लक्ष्मी का रटन करने लगी।

शुक्रवार आते ही उसने पूरे भाव-भक्ति से वैभवलक्ष्मी व्रत शास्त्रीय विधि से करने शुरूआत की। घर में एक साल से कोई मीठी चीज बनायी ही नहीं थी। पर शुक्रवार को थोड़ा गुड़ का शीरा बनाकर माताजी को प्रसाद रखा।

व्रत करके वह जय माॅ लक्ष्मी की रटन करते-करते सो गई।

भोर होने से पहले हेमा को सपने में रंग-बिरंगी फब्बारे वाला बाग दिखाई दिया। वह बाग में उसका हुआ बच्चा खेल रहा था। तुरन्त उसकी ख्ुाल गई।

सवेेरे उठते ही उसने स्नान करके धूप-दीप किया और धनलक्ष्मी माॅ की छबि को लक्ष्मीजी के विविध स्वरूपों को ओर श्रीयंत्र को वंदन करके माथा टेका। फिर लक्ष्मी स्तवन किया। बाद में माताजी के सपने की बात कही। माताजी के मंदिर में जाकर श्रीफल रखा और वहाँ भी सपने की बात कही। बाद में घर आकर पति को सपने की बात कही।

उसके पति ने कहा, तू जो बाग का वर्णन करती है, वह मैसूर का वृन्दावन गार्डन लगता है। मैं एक बार वहाॅ गया था।

तो चलों हम वही जाकर मेरे लाडले को ढूँढेंगे। मेरा मन कहता है माताजी ने ही हमें सपने द्वारा संकेत दिया है।

पति ने स्वीकृति दी। बड़े बेटे को ननद के घर रखकर हेमा पति के साथ उसी दिन मैसूर जाने के लिए निकल पड़ी। मैसूर पहुँचते ही दोनो वृन्दावन गार्डन में गये और व्याकुलता से अपने बच्चें को ढॅूढने लगे। मन में जय माॅ लक्ष्मी का रटन चालू था और चमत्कार हुआ। सपने मे ंहेमा जिस जगह बेटे को देखा था, वही जगह पर उसका बेटा उसके हम उम्र बच्चे के साथ खेल रहा था। उन दोनो बच्चों के नजदीक एक दंपति बैठे थे। वे चेहरे से मद्रासी लगते थे।

हेमा ने दौड़कर अपने बच्चे को गोद में उठा लिया और छाती से चिपका कर रोने लगी। उसका बेटा भी घबराकर रोने लगा। वह मद्रासी दंपति भी स्तब्ध बन कर खड़े हो गये। हेमा के पति ने हेमा को सांत्वना देकर चुप कराया। फिर वह मद्रासी दम्पति भी स्तब्ध बन कर खड़े हो गये। हेमा के पति ने हेमा को सांत्वना देकर चुप कराया। फिर वह मद्रासी दम्पति को बताया कि यह बच्चा उसका है वह कहाँ खो गया था, उसे किस-किस रीत से ढूँढा और पेपर के कटिंग भी दिखाये।

मद्रासी दम्पति ने भी कहा कि यह बच्चा वे लोग कंुभ स्नान करने गये थे तब ट्रेन में से मिला था। बच्चा टेªन में किस तरह आया वह उनको मालूम नहीं था। पर बच्चा बहुत रोता था। अतः वे लोग उसे अपने साथ मैसूर ले आये और अपने बच्चे की तरह पालते थे।
फिर जरूरी कार्यवाही करके, मद्रासी दंपति को बहुत-बहुत धन्यवाद देकर हेमा और उनका पति अपने बेटे को घर ले आये। घर में फिर से सुख का सागर लहराने लगा।

हेमा हर शुक्रवार शाम को कुछ ने कुछ मीठा बनाकर माताजी को प्रसाद रखती। इस तरह इक्कीस शुक्रवार पूर्ण होते ही उसने भाव से उद्यपान किया और एक सौ एक वैभवलक्ष्मी व्रत की किताबे बाॅटी।

हेमा के पड़ोसी वगैरह सब माताजी के व्रत का यह चमत्कार देखकर दंग रह गये।

ऐसा है वैभवलक्ष्मी व्रत का प्रभाव।

लड़की की शादी हुई

रााधा बहन की सुनार जाति में ज्यादातर स्त्रियां गौरवर्ण की और रूपवान। पर राधाबहन की बेटी सेनाली थोड़ी श्याम थी। ऊपर से पति की स्थिति भी साधारण। बड़ा दहेज देने की शक्ति उसमें न थी। सोनाली गे्रजूएट हो गई थी पर उसकी शादी नहीं हो रही थी।

धीरे-धीरे आयु बढ़ने लगी। अतः माता-पिता की चिंता भी बढ़ने लगी। सोनाली खाना पकाने में और इतर प्रवृत्तियों में कुशल थी। स्वभाव से भी सयानी थी। पर शादी की बात में पीछे रह गई।

एक दिन सोनाली अपने काॅलेज फ्रेन्ड हिना से मिलने गई तो हिना एक किताब पढ़ रही थी। सोनाली ने पूछा हिना क्या पढ़ा रही है?
वैभवलक्ष्मी व्रत की किताब हैं हमारी पड़ोसन लीलाबहन ने आज उद्यापन किया है। तो सब को एक-एक किताब बाॅटी थीं।

मुझे दिखा?

हिना से सोनाली को किताब दी। किताब पढ़ते-पढ़ते सोनाली को हुआ मैं भी यह व्रत करके देखूॅ। शायद मेरी शादी हो जाय।
सोनाली ने कहा हिना यह किताब में जाऊँ?

क्यो? व्रत करने का विचार है? हेमा ने हँसकर पूछा।

हाँ!उमर बढ़नी जाती है और दिल बैठा-सा जाता है।

तेरी बात सच्ची है। यह किताब तू ले जा।

शुक्रवार को सवेरे 11 शुक्रवार की मन्नत मानकर सोनाली ने वैभवलक्ष्मी व्रत करने का संकल्प किया और व्रत शुरू किया।
उसी रात उनके फुफाजी एक लड़के की बात लेकर आये। जाति में ख्यातनाम घराना …………….धनवान ……….. लड़का एम0एस0सी0 पास थी। सोनाली की फुफी ने सीधे लड़के के साथ ही बात चला कर सोनाली के गुण गाये थे। वह लड़का शांत स्वभाव की और होशियार लड़की के साथ सादी करने का इच्छुक था। जो उसके व्यापार में हाथ बॅटा सके।

सोनाली तो यह बात सुनकर खुश-खुश हो गई।

अगले शुक्रवार को ही सादगी से सोनाली की शादी हो गई।

ऐसी ही माॅ धनलक्ष्मी की कृपा। वैभवलक्ष्मी व्रत का चमत्कार।